कालियादेह महल और 52 कुंड
500 साल पुरानी जल शुद्धिकरण की अद्भूत इंजीनियरिंग
भैरवगढ़ से 5 किलोमीटर उत्तर में यह महल सूर्य मंदिर व प्रेत पीड़ा से मुक्तिदाता, बावन कुण्ड, कालियादेह महल के नाम से जाना जाता है। सूर्य अर्थात कालप्रियदेव ही आज ’कालियादेह’ कहलाता है। इससे स्पष्ट है कि यह पौराणिक देवता सूर्य का प्राचीन स्थान रहा होगा। आज भी पूरे क्षेत्र में मंदिर ेक अवशेष पाये जाते हैं जिनका उपयोग मध्यकालीन निर्माण में किया गया।
तवारीखशाही के अनुसार नसिरउद्दीन खिलजी ने इसे जल महल का रूप प्रदान किया था। इस स्मरणीय स्थान पर शेरशाह सूरी, अकबर, जहाँगीर आदि आये थे। यहां पर अकबर और जहाँगीर के लेख उत्कीर्ण है।
मराठाकाल में इस क्षेत्र का पुनरूद्धार हुआ। राज माता विजयाराजे सिंधिया ने यहां पुनः सूर्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। यह स्थान उज्जैन का सर्वाधिक स्मरणीय स्थान है।
कालियादेह महल उज्जैन के मंदिर के शहर के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। यह महल बहुत समय पहले वर्ष 1458 ई. में मांडू के सुल्तान द्वारा बनवाया गया था। यह महल क्षिप्रा नदी के बीच एक द्वीप पर स्थित है। पिंडारियों के समय यह महल पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया था और 1920 में श्री माधव राव सिंधिया ने इसे फिर से बहाल किया था। इस महल की वास्तुकला बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसका केन्द्रीय हाल पारसी वास्तुकला का उदाहरण है।
इस महल में अकबर और जहाँगीर की यात्रा पर दो शिलालेख विरासत के रूप में स्थित है। मध्यप्रदेश के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार यह महल के दोनों ओर क्षिप्रा नदी बहती है। उज्जैन शहर में ’कालियादेह महल क्षिप्रा नदीं के बीच में इस तरह बना है कि नदी का पानी छोटी-छोटी नहरों से इधर से उधर आता-जाता है।
इस महल से एक सनकी सुल्तान का किस्सा भी जुड़ा है। उसने अपनी जान बचाने वाले के दोनों हाथ कटवा दिए थे और एक दिन वह इसी महल के अंदर बह रही नदी में डूबकर मर गया।
- क्षिप्रा नदी के बीच में बना महल मध्यकालीन इतिहास की प्रसिद्ध इमारत है।
- पुराणों मंे यहां ब्रह्माकुंड होने का उल्लेख मिलता है। पहले यहां प्राचीन सूर्य मंदिर था जिसके प्रमाण मौजूदा महल की बनावट से मिलते-जुलते हैं।
- जबकि यहां के एक शिलालेख से मालूम होता है कि यह महल 1458 ईसवी में मुहम्मद खिलजी के समय बनवाया गया था।
- 16वीं शताब्दी में मांडू के सुल्तान नासिरूद्दीन खिलजी ने मूल स्थान को तोड़-फोड़कर कालियादेह महल बनवा दिया था।
- सुल्तान को पारा खाने की बुरी आदत थी। उसे ज्यादा गर्मी लगती थी।
- इसलिए अपने शरीर को ठंडा बनाए रखने के लिए वह यहां काफी देर पानी में लेटा रहता था।
- कालियादेह महल उसने इसीलिए बनवाया था और क्षिप्रा के किनारे पर अपने कुंड बनवाए थे।
- कर्नल ल्जुअर्ड ने अपनी ’हिस्ट्री आॅफ दि सेंट्रल इंडिया में लिखा है कि नासिरूद्दीन पारे की गर्मी शांत करने के लिए महल के पास क्षिप्रा नदी के गहरे जल में बड़ी देर तक डुबकी लगाए पड़ा रहता था।
- एक कदिन एक नौकर ने उसको बेहोशी में पड़ा हुआ समझकर बाहर निकाल लिया।
- जब सुल्तान की आंखे खुली तो उसने बाहर निकालने वाले का नाम पूछा।
- बाद में यह कहकर नौकर के दोनों हाथ कटवा दिए कि उसने शाही शरीर को हाथ कैसे लगाया।
- उसके बाद एक दिन गर्मी अधिक चढ़ जाने के कारण सुल्तान नशे की हालत में नदी में लेटे रहने के दौरान डुब गया लेकिन डर के मारे किसी नौकर की हिम्मत नहीं हुई कि वह उसे बाहर निकाले।
- दूसरे दिन जब उसकी लाश इधर-उधर तैरती मिली तब उसकी मौत के बारे में पता चला।
- कालियादेह महल पिंडारियों की लूटपाट के समय में लगभग नष्ट हो गया था।
- अंग्रेजी राज में इसकी मरम्मत की गई। 1920 में ग्वालियर के सिंधिया नरेश ने इसका जीर्णाेद्धार कराया और कोठी महल छोड़कर इसे ही शाही निवास बनाया।
